संतकबीरनगर – घटिया पदार्थों के इस्‍तेमाल से लगातार बीमारियां बढ रही है। महुए के बजाय सड़ी भेलियों (गुड़) को बेस के तौर पर कच्ची शराब बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है। कच्ची शराब लगातार बीमारियों को दावत दे रहा है। घाघरा के दियारा क्षेत्र को कच्ची शराब के निर्माण के लिए सर्वाधिक मुफीद माना जाता है। धनघटा का पौली क्षेत्र नदी के किनारे रामपुर से छपरा तक यह अवैध कारोबार फैला हुआ है। कच्‍ची शराब के निर्माण के लिए कच्चे माल की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता यहीं से होती है।

जानकार बताते हैं कि इसके निर्माण के लिए बहुत ही पुरानी,खराब किस्म की भेलियों का प्रयोग किया जाता है। जबकि कच्ची को ग्रामीणों में ‘महुआ’ के नाम से जाना जाता है। बावजूद इसके इसमें महुए का नामोनिशान नही होता है,इसके स्थान पर यहां पर खराब भेलियां प्रयोग में लाई जा रही हैं। इसी तरह से इसके निर्माण में फिटकिरी,यूरिया,आक्सीटोसीन इंजक्सन समेत बहुत से उत्तेजक और हानिकारक वस्तुओं का प्रयोग होता है। इसका सेवन करने वाले कई तरह की बीमारियों का शिकार हो जाते हैं।

कच्ची शराब के निर्माण पर अंकुश लगाने से पहले इसके निर्माण में प्रयोग में आने वाली कच्ची सामग्री जिससे लहन का निर्माण किया जाता है। निर्माताओं के घरों तक बाइक से रोजाना आपूर्तिकर्ताओं के द्वारा यह अवैध शराब पहुंचाई जाती है। कच्ची के कारोबारियों का काम काफी तेजी से फल-फूल रहा है। जबकि इसमें क्षेत्र के खरबुजहिया,पड़रिया,नकहा,तेजपुर,भोतहा,माझा चहोड़ा,हरिबंशपुर,खड़गपुर समेत दर्जनों गांव शामिल हैं। जिनमें बहुत से गांव पौली चौकी की जद में आते हैं। सड़ी भेलियों की जांच तो खाद्य विभाग ही कर सकता है,लेकिन कच्‍ची के निर्माण और बिक्री की सूचना आने पर जांच कर आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही कब की जाएगी।

रिपोर्ट – पूनम पांडेय

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.