आधुनिक समाज में इंसानों की संख्या भले ही बढ़ रही हो लेकिन रिश्ते घट रहे हैं और अकेलापन बढ़ रहा है। आज अकेलापन समाज की एक गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या बन गयी है । पुराने जमाने में संयुक्त परिवार होते थे । व्यक्ति दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, चचेरे भाई-बहन आदि सभी के साथ मिलजुल कर प्रेमभाव से रहता था । अकेलेपन नाम की चिड़िया के बारे में तो कोई जानता तक नहीं था । लेकिन बढ़ती आधुनिकता, महत्वाकांक्षा व व्यक्तिगत आजादी की चाह के कारण एकल परिवारों की संख्या बढ़ी है । एकल परिवारों की संख्या बढ़ने के साथ रिश्तों में दूरियां और औपचारिकताएं भी बढ़ी हैं । आजकल के बच्चे मौसी, बुआ, चाचा, मामा, ताऊ आदि रिश्तों को या तो भूल चुके हैं, या उनसे दूर हो गए हैं ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2020 तक खास तौर पर अकेलेपन से उपजने वाला अवसाद दुनिया की सबसे गंभीर बीमारी होगी । कुछ निवेश सलाहकार तो मानते हैं कि बड़ा मुनाफा कमाने के लिए आने वाले समय में वृद्धाश्रम एक बहुत ही शानदार व्यापार होगा । वृद्धाश्रम, यानी ऐसे बुजुर्गों की देखरेख का धंधा, जिनके पास पैसा तो होगा लेकिन अपनों का साथ नहीं होगा । आजकल की खबरों में घरों में अकेले बुजुर्ग की मृत्यु की खबरें आती रहती हैं । सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं, अकेलापन बच्चों व बड़ों में भी बढ़ रहा है । बच्चों द्वारा असफल होने पर आत्महत्या कर लेना या अवसाद ग्रस्त हो जाना, ये सब अकेलेपन के परिणाम है । बढ़ते एकल परिवार, अभिभावकों का बच्चों को समय न दे पाना, बढ़ती प्रतिस्पर्धा आदि अवसाद की वजह बने हैं । मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अभिभावकों के पास बच्चों की बात, शिकायतें या परेशानियां सुनने का वक्त नहीं है । बढ़ते तनाव और अति व्यस्तता के कारण बड़ों में भी अवसाद बढ़ा है ।

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